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बंगाल के 500 साल पुराने लोक संगीत से जुड़ा है रणवीर सिंह का ये गाना, सुनते ही दिल को मिलता है सुकून

1 घंटे पहले

फिल्म लुटेरा का गाना 'मोंटा रे' बंगाल के लोक संगीत पर आधारित है। ये संगीत लगभग 500 साल पुराना है।
बंगाल के 500 साल पुराने लोक संगीत से जुड़ा है रणवीर सिंह का ये गाना, सुनते ही दिल को मिलता है सुकून

बंगाल का 500 साल पुराना बाउल संगीत (AI Generated Image)

नई दिल्ली। लुटेरा फिल्म का गाना 'मोंटा रे' सुनते ही मन को सुकून का एहसास होता है। ये गाना लोगों को काफी पसंद आया था और सोशल मीडिया पर भी काफी वायरल हुआ था। इस गाने की खास बात है कि इसके बोल भले ही हिंदी में हैं, लेकिन ये एक बंगाली संगीत से बना है।

जी हां, 'मोंटा रे' गाने में बंगाल के लोक संगीत बाउल संगीत की झलक देखने को मिलती है। बाउल संगीत बंगाली संस्कृति का अहम हिस्सा है और ये गाना उस संगीत से काफी प्रेरित है। आइए जानें बंगाल के इस लोक संगीत के बारे में।

बाउल संगीत का इतिहास

बाउल संगीत का इतिहास 15वीं या 16वीं शताब्दी से जोड़कर देखा जाता है। इस परंपरा में बंगाल के वैष्णव आंदोलन और भक्ति आंदोलन का गहरा प्रभाव है। 19वीं सदी के लालोन फकीर का बाउल संगीत को काफी आगे बढ़ाया। इतना ही नहीं, रवींद्रनाथ टैगोर भी बाउल संगीत से काफी प्रभावित थे, जिसका असर आपको उनकी रचनाओं में भी देखने को मिल सकता है।बाउल संगीत को यूनेस्को ने मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की सूची में भी शामिल किया है।

बाउल संगीत की पहचान क्या है?

बाउल संगीत किसी भी धर्म या जाति से ऊपर उठकर इंसान को खुद के अंदर भगवान खोजने के लिए प्रेरित करता है। बाउल संगीतकार पहले गांव-गांव में घूमकर भजन गाते और भिक्षा मांगकर अपनी गुजर-बसर चलाते। अपने गीतों के जरिए ये लोगों को खुद में भगवान ढूंढ़ने का संदेश देते कि बाहर ईश्वर को खोजने की जगह, आत्म मंथन करके अपने अंदर प्रभू को ढूंढो।

बाउल संगीत को एकतारा या मंजीरा जैसे वाद्य यंत्रों की धुन पर गाया जाता है। इन वाद्य यंत्रों की धुन इस भक्ति संगीत को और भी मधुर बना देते हैं।

काव्य शैली में संगीत

बाउल गीतों की सबसे बड़ी खासियत है कि इनकी भाषा बहुत आसान होती है, जिससे हर कोई इन्हें आसानी से गा और समझ सकता है। हालांकि, साधारण दिखने वाले इनके शब्दों के पीछे काफी गहरे मतलब छिपे होते हैं। इन गीतों में व्यक्ति को बाहरी वस्तुओं को छोड़कर खुद के अंदर झांकने के लिए कहा जाता है।

साथ ही, इन गीतों में रूपक अलंकार का इस्तेमाल किया जाता है, जो इन गीतों को और भी खूबसूरत बनाते हैं। बाउल गीतों को धीमी गति पर गाया जाता है, जो लोगों के दिल को छू जाता है।

मोंटा के में बाउल संगीत की झलक

मोंटा रे के लिरिक्स अमिताभ भट्टाचार्य ने लिखे हैं, लेकिन ये बाउल संगीत से काफी प्रेरित है। इसके बोल ‘कागज के दो पंख लेके उड़ा चला जाये रे’ इंसान के मन के बारे में कह रहा है कि वह पंछी की तरह उड़ता जा रहा है। इस गाने में ऐसी कई तुलनाएं की गई हैं, जो प्रेम से भरे दिल की तुलना बाहरी चीजों से करता है।

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